सेहत

सरकारी स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के बावजूद परिवारों पर खर्च का बोझ और जेब से भुगतान अधिक बनी हुई है

हाल ही में जारी हुई रिपोर्ट के अनुसार, भारत में सरकारी स्वास्थ्य खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि के बावजूद, घरेलू परिवार अभी भी अपने स्वास्थ्य से जुड़े अधिकांश खर्च खुद वहन कर रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में सार्वजनिक निवेश की बढ़ोतरी के बावजूद, लोगों पर आर्थिक दबाव कम नहीं हुआ है।

भारत सरकार ने पिछले कुछ वर्षों में स्वास्थ्य सेवाओं पर निवेश बढ़ाया है, ताकि देशव्यापी स्वास्थ्य सुविधाओं का विस्तार हो सके और जनता को किफायती चिकित्सा सेवा उपलब्ध हो सके। इसके बावजूद, घरेलू परिवारों द्वारा आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च अभी भी उच्च स्तर पर बना हुआ है। इसका मतलब यह है कि जरूरी उपचार या दवाइयां खरीदने के लिए वे अपनी जेब से रकम का भुगतान कर रहे हैं, जो आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए भारी बोझ बन सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, यह स्थिति स्वास्थ्य सेवा प्रणाली की एक गंभीर कमजोरी को दर्शाती है, जहां रोकथाम और प्राथमिक देखभाल पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जा रहा है। रोकथामात्मक स्वास्थ्य सेवाओं और प्राथमिक स्तर के उपचार के लिए अब भी निवेश कम है, जिसके कारण लोग बीमार होने के बाद महंगे इलाज पर निर्भर हो जाते हैं।

सरकार ने कई योजनाओं के माध्यम से सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को सुदृढ़ करने के प्रयास किए हैं, जैसे आयुष्मान भारत योजना, जो निशुल्क स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने का दावा करती है, लेकिन ground level पर इन योजनाओं की पहुँच और प्रभावशीलता में अभी भी कई चुनौतियां हैं। विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि पर्याप्त वित्त पोषण न मिल पाने से रोकथाम के प्रयास अधूरे रह जाते हैं, जिससे गंभीर बीमारियों को टालने में विफलता होती है।

अंतरराष्ट्रीय अनुभवों पर नजर डालें तो स्वस्थ समाज के लिए यह आवश्यक है कि न केवल उपचार बल्कि प्राथमिक और रोकथामात्मक देखभाल को भी उच्च प्राथमिकता दी जाए। इससे न केवल स्वास्थ्य सेवा पर परिवारों का आर्थिक दबाव घटेगा, बल्कि समग्र स्वास्थ्य स्तर में भी सुधार होगा।

इस संदर्भ में, विशेषज्ञों ने उम्मीद जताई है कि आगामी वर्षों में सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र में और वित्तीय संसाधन लगाएगी और रोकथाम पर जोर देगी। साथ ही, जनता तक स्वास्थ्य सेवा को सुलभ और किफायती बनाने के लिए नीति सुधारों पर भी गंभीरता से कार्य होगा। यह कदम न केवल खर्च को नियंत्रित करेगा, बल्कि लागत प्रभावी तरीका अपनाकर देश के स्वास्थ्य स्तर को बेहतर बनाएगा।

अंत में कहा जा सकता है कि वर्तमान में सरकारी स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि के बाद भी परिवारों पर आर्थिक बोझ कम नहीं हुआ है, खासकर जब बात रोकथाम और प्राथमिक देखभाल की आती है। इस स्थिति से निपटने के लिए न केवल वित्तीय निवेश बढ़ाने की जरूरत है, बल्कि सामाजिक जागरूकता और स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में सुधार भी अनिवार्य हैं। यही रास्ता है स्वस्थ और सक्षम भारत का निर्माण करने का।

Source

Related Articles

Back to top button