सेहत

मुंबई में एक जोड़ी पैर: महिलाएं, काम और टीबी

मुंबई, 27 अप्रैल 2024: शहर की चमक-धमक के पीछे छुपी सच्चाई अक्सर अनदेखी रह जाती है, विशेषकर उन महिलाओं के लिए जो असंगठित क्षेत्र में काम करते हुए जीवन और स्वास्थ्य के बीच जद्दोजहद कर रही हैं। मुंबई में टीबी से पीड़ित महिलाओं की एक बड़ी संख्या ऐसी है, जिन्हें न केवल बीमारी का सामना करना पड़ रहा है बल्कि काम के सिलसिले में मिलने वाले न्यूनतम सुरक्षा उपायों और सामाजिक भेदभाव का भी सामना करना पड़ रहा है।

टीबी, एक संक्रामक रोग जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बना हुआ है, विशेष रूप से उन महिलाओं के लिए घातक साबित हो रहा है जो असंगठित रोजगार क्षेत्रों जैसे घरेलू काम, हुडहुडी प्रसंस्करण, सड़क किनारे के छोटे व्यवसायों में जुटे हुए हैं। ये महिलाएं आर्थिक मजबूरियों के चलते इलाज के दौरान काम छोड़ने में असमर्थ होती हैं, जिससे उनकी बीमारी और सामाजिक स्थिति दोनों प्रभावित होती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, मुंबई की स्लम वाली महिलाओं में टीबी के मामले अधिक होने के कई कारण हैं: रहन-सहन की खराब स्थिति, पोषण की कमी, और सामाजिक भेदभाव। इनके साथ ही स्वास्थ्य ढांचे की कमी भी बीमारी के प्रबंधन में बड़ी बाधा है। कई बार, ये महिलाएं बीमारी छुपा कर रखती हैं क्योंकि उन्हें नौकरी या सामाजिक रिश्तों में चरम संकुचन का डर रहता है।

सरकारी प्रयास, जैसे राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम, इन समूहों तक पहुंचने का प्रयास करते हैं, लेकिन असंगठित श्रमिकों के बीच जागरूकता और परीक्षण की पहुँच अभी भी सीमित है। समुदाय स्तर पर जागरूकता बढ़ाने, बेहतर पोषण और सुविधाजनक चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने की आवश्यकता बढ़ती जा रही है।

कुछ गैर-सरकारी संगठन भी मुंबई के इन पहलुओं पर काम कर रहे हैं ताकि टीबी पीड़ित महिलाओं को न केवल उचित इलाज मिले, बल्कि उन्हें रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के अवसर भी मिल सकें। महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता एवं स्वास्थ्य सुरक्षा को बढ़ावा देना ही इस स्थिति से उबरने का कारगर उपाय माना जा रहा है।

समाजिक एवं स्वास्थ्य अधिकारियों ने भी इस मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करते हुए कहा है कि महिलाओं के लिए स्वास्थ्य सुविधाओं को अधिक सहज और किफायती बनाया जाना चाहिए। साथ ही, डॉक्टरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के सहयोग से इन महिलाओं को मानसिक और आर्थिक सहायता भी देना आवश्यक है।

इस संघर्ष के बीच, मुंबई की इन महिलाओं की कहानी देश के बड़े सामाजिक और स्वास्थ्य परिवर्तनों की दास्तां है, जो बताती है कि कैसे गरीबी, बीमारी और लैंगिक असमानता ने उनके जीवन को प्रभावित किया है। इस समस्या के समाधान के लिए सरकार, समाज और स्वास्थ्य संगठनों के बीच सामंजस्य और सक्रिय भागीदारी आवश्यक है।

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