
नई दिल्ली: हिंदू धर्म में अनेक ग्रहों और नक्षत्रों की कथाएं पौराणिक साहित्य में समृद्ध रूप से वर्णित हैं। इनमें से बुध ग्रह (Mercury) की उत्पत्ति एक अत्यंत रोचक और दिव्य कथा है, जो प्राचीन वेदों और पुराणों में जागरूक रूप से दर्ज है। बुध देवता, जिन्हें बुद्ध के नाम से भी जाना जाता है, का जन्म चंद्रमा और तारा देवी के मध्य संबंध से हुआ था।
हिंदू मान्यताओं के अनुसार, चंद्रमा (चंद्र देव) ब्रह्माजी के एक बार वरदान प्राप्त गुरु ब्रिहस्पति (गुरु) के शिष्य थे। ब्रहस्पति देवों के गुरु के रूप में विख्यात हैं, और चंद्रमा उनके परम भक्त भी माने जाते थे। परंतु चंद्रमा की एक विशेष घटना ने बुध ग्रह की उत्पत्ति का मार्ग प्रशस्त किया।
स्रोतों के अनुसार, चंद्रमा की देवी दक्षप्रजा से एक संतान हुई, जो श्रेष्ठ विद्वान और तेजस्वी थी। इस संतान को बुध के रूप में प्रतिष्ठित किया गया। बुध का जन्म चंद्रमा और तारा देवी की दिव्य यौगिक क्रिया से माना जाता है। इस कर्म से बुध भगवान, बुध ग्रह के प्रभु, ज्ञान, बुद्धि और वाक्पटुता के देवता बनकर उभरे।
पुराणों में बुध को ग्रहों का शिक्षक तथा विवेकशील देवता कहा गया है। वे वाणी और व्यापार के देवता माने जाते हैं, जिनका प्रभाव ग्रहों की राशि और जन्म फल पर विशेष प्रभाव डालता है। जहां बुध ग्रह को नीला रंग मान्यता प्राप्त है, वहीं उनका स्थान सूक्ष्म बुद्धि तथा तर्कशक्ति के प्रतीक के रूप में ग्रह Horoscope शास्त्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
धार्मिक कथानक इस प्रकार व्याख्यायित करते हैं कि जब ब्रह्माजी के देवता एकत्रित हुए थे, तब चंद्र ने ब्रहस्पति के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उन्नत ज्ञान प्राप्त किया। इसी क्रम में, चंद्र और दक्षप्रजा से उत्पन्न हुए वंश से बुध का उद्भव हुआ, जिनकी उपस्थिति से ज्योतिष शास्त्र में एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।
संक्षेप में, हिंदू पौराणिक कथाओं में बुध ग्रह का इतिहास न केवल खगोलीय विज्ञान से जुड़ा है बल्कि एक आध्यात्मिक और विद्याप्राप्ति की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जाता है। इस प्रकार बुध ग्रह का जन्म एक दिव्य और प्रेरणादायक कहानी के रूप में स्थापित है, जो आज भी धार्मिक अनुष्ठानों और ज्योतिषीय गणनाओं में गूढ़ और सम्मानित है।



