राजनीति

बंद लेकिन खुला: तमिलनाडु में शराब दुकानों का बंद होना

तमिलनाडु में हर बार जब भी कोई नई सरकार सत्ता में आती है, तो शराब की दुकानों को बंद करने का वादा जरूर किया जाता है। यह वादा जनता के बीच काफी लोकप्रिय होता है, खासकर शिक्षा संस्थानों और पूजा स्थलों के पास अस्थिरता और नशे को कम करने के लिए। वर्तमान में तमिलागा वेत्त्री काजम सरकार ने 717 शराब दुकानों को शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक स्थलों के पास से हटाने का निर्णय लिया है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या ये कदम वास्तव में प्रभावी होगा या फिर यह भी पिछले अनुभवों की तरह दिखावा साबित होगा।

शराब की दुकानों का बंद होना तो शुरू में लोगों को अच्छा लगता है, मगर असल में लोग इस फैसले को लेकर संदेह जताते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि दस-बीस दिन के भीतर ये दुकानें कहीं और खुल जाती हैं, जो सामाजिक नियंत्रण के बजाय अस्थाई समाधान लगते हैं। विशेषज्ञ और आम जनता दोनों इस बात पर ध्यान देते हैं कि शराब की दुकानों की संख्या कम होनी चाहिए, लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि खुले हुए स्थानों को सही तरीके से चुना जाए ताकि शराब के कारण होने वाले नकारात्मक प्रभाव कम हो सकें।

तमिलनाडु में लगभग तीन दशकों से शराब नीति को लेकर विवाद चल रहा है। सरकारें बार-बार दुकानें बंद करने और फिर नई जगहों पर खोलने में उलझ जाती हैं। इस बार भी 717 दुकानों को शिक्षा और पूजा स्थलों के आसपास से हटाने का ऐलान किया गया है, जो कि सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से एक सराहनीय कदम है। हालांकि इसके सफल क्रियान्वयन के लिए पारदर्शिता, उचित निगरानी और स्थानीय समुदाय की भागीदारी अत्यंत आवश्यक है।

सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि शराब की दुकानों का बंद होना नशे के दुष्प्रभावों को कम करने में मदद करेगा, लेकिन इसके साथ ही नशा मुक्ति कार्यक्रमों और जागरूकता अभियानों को भी तेज करना होगा। इसके बिना सिर्फ दुकानों का स्थानांतरण समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। तमिलनाडु सरकार के इस निर्णय पर जनता की निगाहें टिक गई हैं कि क्या यह बदलाव सचमुच स्थायी और प्रभावी होगा या नहीं।

समग्र रूप से देखा जाए तो बीजेपी की तरह तमिलागा वेत्त्री काजम सरकार ने भी अपने चुनावी वादों में शराब दुकानों को बंद करने का वादा किया है, जो सामाजिक और नैतिकता के दृष्टिकोण से प्रशंसनीय है। लेकिन कार्यान्वयन की गति और जनता के विश्वास को बनाए रखना प्रमुख चुनौती होगी। जनता उम्मीद कर रही है कि इस बार यह कदम केवल कागजों पर ही न रहे और शराब की दुकानों की संख्या और उनकी उपलब्धता को लेकर ठोस सुधार देखने को मिले।

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